क्या आपको पता है “कहां राजा भोज और कहाँ गंगू तेली” की कहावत के पीछे की कहानी सच

क्या आपको पता है “कहां राजा भोज और कहाँ गंगू तेली” की कहावत के पीछे की कहानी सच 

क्या आपको पता है “कहां राजा भोज और कहाँ गंगू तेली” की कहावत के पीछे की कहानी सच
Samrat raja bhoj

Story Of “कहां राजा भोज और कहाँ गंगू तेली” | इस कहावत के उपर भारतीय हिंदी सिनेमा में एक गाना भी बनाया गया है। यही नहीं, किसी के उपर तंज कसने के लिए भी भारत में इस कहावत का प्रयोग किया जाता हैं। यह कहावत इतनी लोकप्रिय है। कि आम बोलचाल में कहीं न कहीं किसी न किसी की जुबान से यह कहावत निकल ही जाती है। लेकिन इस कहावत के पीछे की कहानी की सत्यता क्या है ?? आज हम इस पर प्रकाश डालेंगे।

भारत के मध्यप्रदेश राज्य की राजधानी भोपाल शहर से करीब 250 किलोमीटर दुरी पर धार जिला ही राजा भोज की “धारानगरी” माना जाता है। ये शहर 11 वीं सदी में मालवा की राजधानी भी रहा। राजा भोज ने इस भव्य नगरी को बसाया था। उसी राजाभोज की प्रशंसा बड़े बड़े विद्वान् और राजा महाराजा तथा सामान्य जनमानस भी करते आ रहे हैं।

राजा भोज के प्रशंसकों की इस पर्थ्वी पर कमी नहीं है। बहुत सारी प्रतिभाओ के धनी राजा भोज शस्त्रों के साथ-साथ ही शास्त्रों के भी ज्ञाता थे। राजा भोज ने वास्तुशास्त्र, व्याकरण, आयुर्वेद, योग, साहित्य और धर्म पर कई ग्रंथ और टीकाएँ लिखे है। 

यह भी कहा जाता है कि भोपाल को बहुत सयम पहले “भोजपाल” कहा जाता था तथा बाद में “भोजपाल” का “ज” हटाकर ही इसका नाम “भोपाल” कर दिया गया | VIP सडक से भोपाल शहर के अन्दर आते ही आपको राजा भोज की एक बहुत बड़ी और विशाल मूर्ति के दर्शन करने को मिल जाते हैं |

राजा भोज ने 11 वीं सदी में अपने 40 साल के शासन काल में बहुत से मंदिरों और इमारतों का निर्माण कराया था| उन्ही कराए गए निर्माणों में से एक है भोजशाला। यह भी कहा जाता है कि राजा भोज माता सरस्वती की पूजा करते थे और राजा भोज ने भोजशाला में माता सरस्वती की एक मूर्ति की स्थापना कराई थी| जो आज इंग्लैंड की राजधानी (लंदन) में मौजूद है।

“गंगू तेली नहीं अपितु गांगेय तैलंग”

क्या आपको पता है “कहां राजा भोज और कहाँ गंगू तेली” की कहावत के पीछे की कहानी सच
Samrat raja bhoj

राजा भोज ने भोजशाला का निर्माण कराया वह आज भी देश-विदेस में जाने जाते हैं इस कहावत के रूप में- “कहां राजा भोज कहां गंगू तेली“। परन्तु इस कहावत के बोल गंगू तेली नहीं अपितु “गांगेय तैलंग” हैं। गंगू का अर्थ गांगेय कलचुरि नरेश तथा तेली का अर्थ चालुका नरेश तैलय यह दोनों मिलकर भी राजा भोज को नहीं हरा सके थे।

ये दोनों दक्षिण के राजा थे। तथा इन दोनों ने धार नगरी पर आक्रमण कर दिया था मगर दोनों को मुंह की खानी पड़ी थी। इन दोनों के युद्ध में हार जाने पर धार के लोगों ने ही दोनों की हंसी उड़ाई कि “कहां राजा भोज कहां गांगेय तैलंग”। गांगेय तैलंग का ही विकृत रूप है “गंगू तेली” । जो आज इस जगत में “कहां राजा भोज कहां गंगू तेली“ की कहावत के रूप में प्रसिद्ध है ।

धार शहर में पहाड़ी पर तेली की लाट रखी हैं. कहा जाता है कि राजा भोज पर हमला करने आए तेलंगाना के राजा इन लोहे की लाट को यहीं छोड़ गए और इसलिए इन्हें तेली की लाट कहा जाता है।

“कहाँ राजा भोज, कहाँ गंगू तेली” कहावत का यही असली रहस्य हैं । इसी पर चल पड़ी थी यह कहावत।

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