दक्षिणेश्वर काली मंदिर जाने से पहले जरूर जान ले ये बातें | Dakshineswar Temple Kolkata

दक्षिणेश्वर काली मंदिर जाने से पहले जरूर जान ले ये बातें | Dakshineswar Temple Kolkata 

दक्षिणेश्वर काली मंदिर जाने से पहले जरूर जान ले ये बातें | Dakshineswar Temple Kolkata
dakshineswar temple 
जैसा कि हम सभी जानते हैं। कि हिंदू मान्यताओं में 33 करोड़ देवी देवताओं का जिक्र किया गया है। जिनमें से एक है मां काली से जुड़े अनेकों चमत्कारी किस्से हमारे इतिहास में विधमान है और इन्ही कहानियों और किस्सों में से एक है। दक्षिणेश्वर काली मंदिर जोकि उत्तर कोलकाता में बैरकपुर में विवेकानंद सेतु से कोलकाता के छुर के निकट हुगली नदी के किनारे स्थित एक ऐतिहासिक dakshineswar mandir हिंदू मंदिर है। दोस्तों यह मंदिर अद्भुत है और इसकी महिमा विश्व प्रसिद्ध है। इस मंदिर की मुख्य देवी भवतारनी है। जो की मान्यता अनुसार मां काली का ही एक रूप है। दोस्त यह वही मंदिर है। जहां मां काली की आराधना करते हुए रामकृष्ण ने परमहंस की अवस्था प्राप्त की थी और वे रामकृष्ण परमहंस कहलाए। यह वही मंदिर है जहां रामकृष्ण मां काली के साक्षात्कार दर्शन किया करते थे। दोस्तों यह वही मंदिर है। जहां मेरे दोस्त ने खुद जाकर एक अद्भुद अनुभव किया है। जहां ऐसा लगता है कि यह संपूर्ण जगह मां काली के वात्सल्य से परिपूर्ण है। 

दक्षिणेश्वर काली मंदिर जाने से पहले जरूर जान ले ये बातें | Dakshineswar Temple Kolkata
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दोस्तों आज मैं आपको दक्षिणेश्वर काली मंदिर से जुड़ी उन सभी बातों को बताऊंगा। जिसे जानकर आप भी इस दिव्य मंदिर के दर्शन जरूर करना चाहेंगे। दक्षिणेश्वर काली मंदिर का निर्माण एक शूद्र जमीदार की विधवा पत्नी रासमणि ने करवाया था। जिस दौर में इस मंदिर का निर्माण हुआ था। उस काल में संपूर्ण बंगाल में कुलीन प्रथा जोरों पर थी। ऐसे में एक शूद्र स्त्री द्वारा इस मंदिर dakshineswar mandir का निर्माण और साथ ही इस मंदिर को समाज द्वारा स्वीकार करने के पीछे एक अद्भुत कथा छुपी हुई है। कहा जाता है कि रानी रासमणि जब अपनी तीर्थ यात्रा की शुरुआत वाराणसी से करने वाली थी। तब रानी को एक रात मां काली ने सपने में आकर दर्शन दिए। मां काली ने उन्हें एक ऐसे स्थान का परिचय करवाया। जहां इस मंदिर का निर्माण होना था। धन की कमी ना होने की वजह से रानी रासमणि ने मां काली को समर्पित इस मंदिर का निर्माण करने की ठान ली। सन 1847 में इस मंदिर का निर्माण कार्य शुरू हुआ जो कि करीब 8 वर्षों तक चला।

Dakshineswar Temple Kolkata

सन 1855 में इस मंदिर का निर्माण कार्य पूर्ण हुआ। इस मंदिर को बनवाने में करीब ₹900000 की लागत आई। यह मंदिर 25 एकड़ भूमि में बना हुआ है। जिस समय इस मंदिर का निर्माण हुआ था। उस समय समाज में छुआछूत समस्या के कारण एक शूद्र स्त्री द्वारा मंदिर का निर्माण कराए जाने से कोई भी ब्राह्मण इस मंदिर का पुजारी बनने को तैयार नहीं था। ने तो धन की कमी थी और ना ही सामाजिक आन की लेकिन बस शूद्र होने की वजह से रानी रासमणि के मंदिर में कोई भी पुजारी धार्मिक कार्य करने के लिए तैयार नहीं था। रामकृष्ण परमहंस के बड़े भाई ने इस मंदिर का पुजारी बनना स्वीकार किया। यह मंदिर dakshineswar mandir दार्शनिक एवं धर्म गुरु स्वामी रामकृष्ण परमहंस की कर्म भूमि रही है। सन 1857 से लेकर 1868 के बीच स्वामी रामकृष्ण इस मंदिर के प्रधान पुरोहित रहे। तत्पश्चात उन्होंने इस मंदिर को ही अपना साधना स्थल बनाया था। 

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दक्षिणेश्वर काली मंदिर जाने से पहले जरूर जान ले ये बातें | Dakshineswar Temple Kolkata
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वैसे तो हर मंदिर में एक पुजारी होता है। जोकि मंदिर में स्थापित देवी देवताओं की पूजा एवं सेवा करता है। लेकिन इस मामले में रामकृष्ण परमहंस थोड़े अलग थे। रामकृष्ण परमहंस मां की पूजा तो करते थे। लेकिन वे भूखे-प्यासे सिर्फ मां काली को ही निहारते रहते थे और भीतर-ही-भीतर यह सोचते रहते थे। कि कब मां उन्हें दर्शन देगी। रामकृष्ण परमहंस माँ काली के सामने रोते रहते थे। जैसे कोई बालक अपनी मां से बिछड़ गया हो। कई मायनों में इस मंदिर dakshineswar mandir की प्रतिष्ठा और ख्याति का प्रमुख कारण है। स्वामी रामकृष्ण का इस मंदिर से लगाव

मंदिर के प्रमुख प्रांगण में उत्तरी-पश्चिमी कोने पर स्वामी रामकृष्ण परमहंस का कक्ष आज भी उनकी ऐतिहासिक स्मृतियों के रूप में संरक्षित करके रखा गया है। इस मंदिर के प्रांगण में मां काली के अलावा शिव और कृष्ण के मंदिर भी है। दोस्तों क्या आपको पता है कि दक्षिणेश्वर मंदिर में भगवान कृष्ण को समर्पित राधा गोविंद मंदिर में कृष्ण की खंडित मूर्ति की भी पूजा की जाती है। इसके पीछे भी एक अद्भुत कथा है। इसमें भी रामकृष्ण परमहंस के उपदेश जुड़े हुए हैं। 


एक बार की बात है मंदिर बनकर तैयार था। जन्माष्टमी के अगले दिन राधा गोविंद मंदिर में नंदो उत्सव की धूम थी। दोपहर की आरती और भोग के बाद श्री कृष्ण जी को उनके कक्ष में ले जाते समय कृष्ण जी की मूर्ति धरती पर गिर गई। जिसकी वजह से उनका पाव टूट गया। सभी के लिए यह अमंगल का समय था। सभी भक्त इस दुविधा में थे। कि उनसे ऐसा क्या अपराध हुआ। जो कृष्ण जी उनसे नाराज हो गए हैं। वे आने वाले प्रकोप से भयभीत थे। रानी रानी रासमणि भी बेहद चिंतित थी। उन्होंने ब्राह्मणों को बुलाया और पूछा की इस खंडित मूर्ति का क्या किया जाए। ब्राह्मणों ने जवाब दिया कि इस मूर्ति को जल में प्रवाहित कर इसके स्थान पर नई मूर्ति को विराजित किया जाए। लेकिन रानी रासमणि को ब्राह्मणों का यह सुझाव पसंद नहीं आया और वे रामकृष्ण परमहंस के पास गई। क्योंकि उनके भीतर उनकी गहरी आस्था थी। स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने रानी के जो कहा वह हर माइने में अद्भुत था। रामकृष्ण ने कहा कि जब घर का कोई सदस्य विकलांग हो जाता है। तो क्या उन्हें त्याग करके एक नया सदस्य लाया जाता है नहीं बल्कि उनकी सेवा की जाती है। बस फिर क्या था। रानी रासमणि को स्वामी परमहंस का यह सुझाव बेहद पसंद आया और उन्होंने यह कहा कि इस मंदिर dakshineswar mandir में कृष्ण जी की इसी मूर्ति की पूजा की जाएगी और साथ ही उनकी देखभाल भी होगी।

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दक्षिणेश्वर काली मंदिर जाने से पहले जरूर जान ले ये बातें | Dakshineswar Temple Kolkata
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उस दिन से लेकर आज तक मंदिर में कृष्ण जी की उस खंडित मूर्ति की पूजा की जाती है। दक्षिणेश्वर मंदिर के भीतरी भाग पर चांदी से बनाए गए कमल के फूल पर माँ काली शस्त्रों सहित भगवान शिव के ऊपर खड़ी है। माँ काली का यह मंदिर नवरत्न की तरह निर्मित है और यह 46 फुट चौड़ा और 100 फुट ऊंचा है। यह मंदिर हरे भरे मैदान पर स्थित है। इस मंदिर dakshineswar mandir के पास पवित्र गंगा नदी है। जो बंगाल में हुगली नदी के नाम से जानी जाती है। मंदिर के प्रांगण में भगवान भोलेनाथ के 12 मंदिर स्थापित किए गए। श्रद्धालु जब इस मंदिर में दर्शन करने आते हैं। तो यहां स्थित 12 शिवलिंग पर गंगा जल से अभिषेक करते हैं। 

image source :- wikipedia

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दोस्तों अगर मैं इस मंदिर का गुणगान करता रहूं तो शायद ही यह पोस्ट कभी ख़त्म ना हो। दोस्तों अगर आप इस मंदिर dakshineswar mandir में दर्शन के लिए आएंगे तो आपको कोई भी पंडित पूजा करने के लिए जोर जबरदस्ती नहीं करेंगे और यही बात मुझे सबसे ज्यादा अच्छी लगती है। आप चाहे तो प्रसाद लेकर पूजा कर सकते हैं। या तो सीधे जाकर मां के दर्शन कर सकते हैं। आपसे कोई भी पंडित न तो चढ़ावे की डिमांड करेगा और न ही जोर जबरदस्ती पूजा करने के लिए कहेगा। दोस्तों यह मंदिर अद्भुत शक्ति से संपूर्ण है। और इसका अनुभव आपको मंदिर में आकर ही महसूस होगा। 

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